बिहार

रिम्स समेत दस जिलों में फैक्टर दवाओं की कमी, मरीजों पर बढ़ा खतरा

 रांची
 झारखंड में हीमोफीलिया के मरीजों के सामने गंभीर स्वास्थ्य संकट खड़ा हो गया है। रिम्स और रांची सदर अस्पताल समेत राज्य के दस जिलों (चतरा, हजारीबाग, रामगढ़, पलामू, गढ़वा, धनबाद, गोड्डा, जमशेदपुर और चाईबासा) के सरकारी अस्पतालों में पिछले दो-तीन महीनों से फैक्टर-8 और फैक्टर-9 जैसी जीवनरक्षक दवाएं नहीं हैं।

आपूर्ति न होने से मरीजों को या तो दवा दुकानों से बेहद महंगी दवा खरीदनी पड़ रही है या वे रक्तस्राव (ब्लीडिंग) के जानलेवा जोखिम का सामना करने को मजबूर हैं।

चिकित्सकों का कहना है कि यह कोई सामान्य दवा नहीं है। समय पर खुराक नहीं मिलने से बच्चों में मामूली चोट भी गंभीर साबित हो सकती है।

आपूर्ति ठप
एक्टिविस्ट संतोष जायसवाल ने आरोप लगाया कि दवा आपूर्ति करने वाली एजेंसी की लापरवाही से राज्यभर के डे-केयर सेंटरों का स्टाक खत्म हो गया है। मरीज लगातार अस्पतालों के चक्कर काट रहे हैं, पर उन्हें केवल आश्वासन मिल रहा है।

उन्होंने दोषी एजेंसी पर कार्रवाई की मांग की। लहू बोलेगा संस्था के संस्थापक नदीम खान ने बताया कि सरकारी व्यवस्था ठप होने से मरीजों को हर महीने करीब 20 हजार रुपये की दवा खरीदनी पड़ रही है।

यहां तक कि उन्हें आयरन की गोलियां भी बाहर से लेनी पड़ रही हैं। राज्य में रक्त विकारों से पीड़ित मरीजों की अनुमानित संख्या करीब 20 हजार है, लेकिन अब तक इनका व्यापक सर्वे भी पूरा नहीं हो सका है।

क्या है फैक्टर-8 व 9, क्यों है जरूरी
शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. पीके चौधरी के अनुसार, फैक्टर-8 व फैक्टर-9 खून में पाए जाने वाले जरूरी प्रोटीन हैं। इन्हें क्लाटिंग फैक्टर्स (थक्का जमाने वाले कारक) कहा जाता है।

इनका मुख्य काम चोट लगने पर खून का बहाव रोकना है। शरीर में फैक्टर-8 प्रोटीन की कमी से हीमोफीलिया-ए होता है। जबकि फैक्टर-9 प्रोटीन की कमी से हीमोफीलिया-बी होता है।

सरल शब्दों में दोनों बीमारी खून का थक्का न बनने की समस्या हैं। अंतर इतना है कि ‘ए’ में फैक्टर-8 प्रोटीन व ‘बी’ में फैक्टर-9 प्रोटीन गायब होता है। दवा जरूरी है।

Show More

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button