
नई दिल्ली
अमेरिका में भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने कहा कि सिंधु जल संधि सद्भावना और मित्रता की भावना से की गई थी, लेकिन पाकिस्तान ने आधी सदी तक अपने आचरण से इस भावना को नष्ट कर दिया। 'न्यूजवीक' पत्रिका में प्रकाशित एक लेख में क्वात्रा ने कहा कि सिंधु जल संधि को स्थगित करना कोई नई स्थिति पैदा करना नहीं है, बल्कि पहले से बिगड़े हुए संबंधों को औपचारिक रूप से स्वीकार करना है। क्वात्रा का यह लेख ऐसे समय में प्रकाशित हुआ है, जब पाकिस्तान ने भारत द्वारा 23 अप्रैल 2025 को सिंधु जल संधि को स्थगित रखने के फैसले के विरोध में हाल ही में एक सम्मेलन आयोजित किया था। भारत ने यह निर्णय 22 अप्रैल 2025 को जम्मू कश्मीर के पहलगाम में पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों द्वारा 26 लोगों की हत्या के एक दिन बाद लिया था। मारे गए लोगों में अधिकतर पर्यटक थे।
याद रखनी चाहिए संधि की प्रस्तावना
क्वात्रा ने लिखा, ''यह याद रखना चाहिए कि संधि की प्रस्तावना में कहा गया है कि इसे 'सद्भावना और मित्रता की भावना' से किया गया था। पाकिस्तान ने आधी सदी तक इसी सद्भावना और मित्रता को नष्ट करने का काम किया। संधि को स्थगित रखना केवल उस स्थिति को स्वीकार करना है, जिसे पाकिस्तान अपने आचरण से पहले ही समाप्त कर चुका था।''
वर्ष 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हस्ताक्षरित सिंधु जल संधि के तहत सिंधु नदी तंत्र की छह नदियों में से तीन नदियों का नियंत्रण भारत को मिला, जिनमें बेसिन के लगभग 20 प्रतिशत जल का प्रवाह होता है जबकि पाकिस्तान को उन नदियों पर अधिकार मिला, जिनमें लगभग 80 प्रतिशत जल प्रवाहित होता है। क्वात्रा ने कहा, ''इस असमान व्यवस्था ने भारत के उन क्षेत्रों के विकास को दशकों तक बाधित किया, जिन्हें बेहतर जल अधिकार मिलने से लाभ हो सकता था। इसके बावजूद भारत ने संधि का पूरी निष्ठा से पालन किया।''
पाकिस्तान ने बार-बार तोड़े संधि के नियम
उन्होंने कहा कि इसके जवाब में पाकिस्तान ने 1965, 1971 और 1999 में भारत के खिलाफ युद्ध छेड़े। इसके अलावा उसने दशकों तक शत्रुतापूर्ण रवैया और सीमा पार आतंकवाद जारी रखा, जिसमें 2001 में भारतीय संसद पर हमला, 2008 के मुंबई आतंकवादी हमले, 2016 के उरी और पठानकोट हमले, 2019 का पुलवामा हमला और 2025 का पहलगाम हमला शामिल हैं।
क्वात्रा ने कहा कि यदि पाकिस्तान वास्तव में द्विपक्षीय मुद्दों पर भारत का सहयोग चाहता है, तो उसे सबसे पहले वर्षों में तैयार किए गए अपने आतंकी ढांचे को समाप्त करना होगा। उन्होंने कहा कि संधि के तहत भारत द्वारा शुरू की गई परियोजनाओं के प्रति पाकिस्तान की मुख्य प्रतिक्रिया अड़चनें पैदा करना और नौकरशाही स्तर पर देरी करना रही है। उन्होंने कहा, ''पाकिस्तान ने लगातार भारत के उन प्रयासों को भी अवरुद्ध किया, जिनके तहत छह दशकों में हुए तकनीकी बदलावों को ध्यान में रखते हुए संधि में संशोधन किया जा सकता था। इससे भारत अपनी जलविद्युत क्षमता का बेहतर विकास कर सकता था।''
क्वात्रा ने कहा, ''पाकिस्तान के लगातार इस रवैये और अड़चनों के कारण भारत का यह भरोसा धीरे-धीरे खत्म हो गया कि वह सिंधु जल संधि के तहत अपने वैध अधिकारों का पूरी तरह उपयोग कर पाएगा या बदलते समय के अनुरूप संधि में सुधार कर सकेगा।'' उन्होंने कहा कि जो लोग भारत और पाकिस्तान के बीच फिर से बातचीत की वकालत कर रहे हैं, वे या तो अतीत के अनुभवों को नजरअंदाज कर रहे हैं, या फिर यह मानते हैं कि एक ही तरीका बार-बार अपनाने पर भी अलग नतीजे मिल सकते हैं।
साथ नहीं चल सकते आतंक और व्यापार
क्वात्रा ने कहा, ''प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज भारत का स्पष्ट रुख व्यक्त किया है: 'आतंक और वार्ता साथ-साथ नहीं चल सकते… आतंक और व्यापार साथ-साथ नहीं चल सकते… पानी और खून एक साथ नहीं बह सकते।''' उन्होंने कहा कि पाकिस्तान जिस जल संकट का सामना कर रहा है, वह इस्लामाबाद की सरकार के कुप्रबंधन का परिणाम है।
भारतीय राजदूत ने कहा, ''…पाकिस्तान सरकार को भारत को दोषी ठहराने और धमकियां देने के लिए सम्मेलन आयोजित करने के बजाय अपनी बेहद खराब जल उत्पादकता और जल प्रबंधन को सुधारने पर ध्यान देना चाहिए।'' उन्होंने कहा कि हर आंतरिक विफलता का ठीकरा भारत के सिर फोड़ने की पाकिस्तान की आदत अब पुरानी हो चुकी है। क्वात्रा ने कहा, ''दुनिया को इस बात को बिना किसी हिचकिचाहट या अस्पष्टता के स्पष्ट रूप से कहना चाहिए।'






