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विदेशी डिग्री में भारतीय छात्रों का रुचि कम, 3 साल में 31% घटे आवेदन; क्या है कारण?

नई दिल्ली:

एक समय था जब भारतीय युवाओं के बीच 'विदेशी डिग्री' का जबरदस्त क्रेज था, लेकिन अब तस्वीर बदल रही है. हाल के सरकारी आंकड़े और वैश्विक राजनीतिक हालात यह संकेत दे रहे हैं कि भारतीय छात्र अब विदेश जाने के बजाय देश में ही संसाधनों का सही इस्तेमाल करना बेहतर समझ रहे हैं.

शिक्षा मंत्रालय द्वारा संसद में पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार, विदेश जाने वाले छात्रों की संख्या में भारी गिरावट आई है. जहां 2023 में 9.08 लाख छात्र विदेश गए थे, वहीं 2025 में यह संख्या घटकर मात्र 6.26 लाख रह गई है. यह 30% से अधिक की गिरावट एक बड़े बदलाव की ओर इशारा करती है.

विदेश जाने वाले भारतीय छात्रों की संख्या (2023-2025)
यह डेटा उन छात्रों का है जिन्होंने प्रस्थान के समय अपना उद्देश्य 'शिक्षा/पढ़ाई' बताया था.
वर्ष           छात्रों की संख्या          स्थिति
2023      9,08,364                 उच्चतम स्तर
2024     7,70,127               15% की गिरावट
2025     6,26,606               18% की और गिरावट
कुल बदलाव     2,81,758       31% की संचयी गिरावट

ट्रम्प प्रशासन और विकसित देशों की सख्ती
इस गिरावट के पीछे सबसे बड़ा कारण प्रमुख देशों की बदलती आप्रवासन नीतियां हैं.

अमेरिका
अमेरिका में ट्रम्प प्रशासन के आने के बाद वीजा नियमों में सख्ती और एच-1बी (H-1B) वीजा को लेकर अनिश्चितता ने छात्रों को डरा दिया है. छात्र अब लाखों रुपये खर्च करने के बाद वहां नौकरी मिलने की गारंटी पर संदेह कर रहे हैं.

कनाडा और ऑस्ट्रेलिया
कुछ समय पहले तक कनाडा भारतीयों की पहली पसंद था, लेकिन वहां रहने के खर्च में वृद्धि, आवास संकट और 'स्टडी परमिट' पर लगाई गई सीमा ने छात्रों को हतोत्साहित किया है. ऑस्ट्रेलिया ने भी हाल ही में अपने वीजा नियमों को कड़ा कर दिया है.

अन्य संकट
यूक्रेन युद्ध और अन्य देशों में बढ़ती अस्थिरता ने भी छात्रों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या विदेशी जमीन पर उनका भविष्य और पैसा सुरक्षित है.

संसाधनों की बर्बादी और आर्थिक बोझ
विश्लेषकों का मानना है कि भारतीय परिवार अब इस बात का बारीकी से आकलन कर रहे हैं कि विदेशी शिक्षा पर खर्च किए गए 50 लाख से 1 करोड़ रुपये का 'रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट' (ROI) क्या है. कई मामलों में, विदेश से पढ़ाई करने के बाद भी छात्रों को वैसी नौकरियां नहीं मिल रही हैं जिनसे वे अपना शिक्षा ऋण चुका सकें. इसे अब 'संसाधनों की बर्बादी' के रूप में देखा जाने लगा है.

भारत में ही 'विदेशी शिक्षा' का विकल्प
भारत सरकार ने भी इस स्थिति को भांपते हुए देश के भीतर ही अंतरराष्ट्रीय स्तर की शिक्षा लाने की तैयारी कर ली है:

    भारत में विदेशी कैंपस: यूजीसी (UGC) ने 14 विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में कैंपस खोलने की अनुमति दी है. यानी अब भारतीय छात्र अपने देश में रहकर, कम खर्च में और बिना किसी सुरक्षा जोखिम के विदेशी डिग्री हासिल कर सकेंगे.
    गिफ्ट सिटी का मॉडल:
गुजरात के गिफ्ट सिटी में ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन के विश्वविद्यालयों ने काम शुरू कर दिया है, जो एक गेम-चेंजर साबित हो रहा है.

घरेलू संस्थानों का बढ़ता दबदबा
संसद में पेश रिपोर्ट बताती है कि भारत अब खुद एक ग्लोबल हब बन रहा है. 2026 की क्यूएस रैंकिंग में भारत के 54 संस्थान शामिल हैं. स्टार्टअप कल्चर और ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स में भारत की 38वीं रैंक ने छात्रों को यह भरोसा दिलाया है कि रोजगार के सबसे अच्छे अवसर अब भारत के भीतर ही मौजूद हैं.

साफ है कि बदलती वैश्विक राजनीति, वीजा की अनिश्चितता और भारी-भरकम खर्च ने भारतीय छात्रों को अपनी प्राथमिकताएं बदलने पर मजबूर कर दिया है. छात्र अब अपने संसाधनों को ऐसी जगह निवेश करना चाहते हैं जहाँ सुरक्षा और करियर दोनों की गारंटी हो. 'ब्रेन ड्रेन' (प्रतिभा पलायन) का दौर अब धीरे-धीरे 'ब्रेन गेन' (प्रतिभा वापसी) में बदलता दिख रहा है.

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