छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ में पानी टैंकर खरीद पर बड़ा सवाल! 1.30 लाख की टंकी के लिए खर्च किए 2.50 लाख

डोंगरगढ़.

डोंगरगढ़ जनपद के ग्राम पंचायतों में विकास के नाम पर खर्च होने वाली 15वें वित्त की राशि से पानी टैंकर खरीदी अब सवालों के घेरे में है. आरोप है कि GeM पोर्टल के जरिए ऐसी खरीदी कराई गई, जिसमें बाजार कीमत और पंचायतों से किए गए भुगतान के बीच बड़ा अंतर है.

कई पंचायतों में 2.50 लाख रुपये तक के भुगतान की जानकारी सामने आई है. मामला सिर्फ महंगे टैंकर की खरीदी तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रस्ताव, आपूर्ति, सत्यापन और भुगतान की पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो रहे हैं. सबसे बड़ा सवाल, 1.30 लाख का टैंकर ढाई लाख में क्यों? उपलब्ध जानकारी के मुताबिक करीब 2500 लीटर क्षमता वाले कृषि टैंकर की बाजार कीमत लगभग 1.30 लाख रुपये के आसपास बताई जा रही है, लेकिन ग्राम पंचायत अछोली, सलोनी, तोतल भर्री, प्लांदुर, पिपरखार और मोहनपुर में इसी क्षमता के टैंकर के लिए 2.50 लाख रुपये का बिल सामने आया है. यानी बाजार कीमत की तुलना में भुगतान लगभग दोगुना होने का दावा है. आखिर कीमत तय करने का आधार क्या था, यह जांच का बड़ा सवाल है.

टैंकर पहले पंचायत में पहुंचा, प्रस्ताव बाद में
मामले में ग्राम पंचायतों के सरपंच-सचिवों से मिली जानकारी और उनके बयानों ने पूरी प्रक्रिया पर और सवाल खड़े कर दिए हैं. आरोप है कि कुछ जगह पंचायत का प्रस्ताव बनने से पहले ही पानी टैंकर पहुंच गया. बाद में GeM पोर्टल की प्रक्रिया पूरी कर भुगतान कराया गया. पंचायत प्रतिनिधियों का कहना है कि उन्हें GeM की तकनीकी प्रक्रिया की पूरी जानकारी नहीं थी और जनप्रतिनिधियों के दबाव में उन्होंने इसे शासकीय कार्य मानकर भुगतान कर दिया.

एक ही जिले में टैंकर, लेकिन कीमतों में बड़ा अंतर
डोंगरगढ़ के बेलगांव और बोरतलाव क्षेत्र की पंचायतों में दो पहिया ट्रॉली वाले टैंकर के लिए भी करीब 2.50 लाख रुपये तक भुगतान किए जाने की जानकारी है. वहीं मुरमुन्दा क्षेत्र के धनडोंगरी और खल्लारी में चार पहिया टैंकर के लिए करीब 2.45 लाख रुपये भुगतान का उल्लेख है. सवाल यह है कि जब क्षमता और टैंकर की बनावट में अंतर है, तो कीमतों का निर्धारण किस तकनीकी मूल्यांकन पर हुआ?

सोलर फर्म से कृषि टैंकर की खरीदी क्यों?
दस्तावेजों के अनुसार कई पंचायतों ने भिलाई स्थित मेसर्स सिटी सोलर से शिवशक्ति एग्रो का वाटर टैंकर खरीदा. सवाल यह नहीं है कि GeM पर फर्म पंजीकृत थी या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि क्या खरीद से पहले बाजार दर, उत्पाद की गुणवत्ता और अन्य उपलब्ध विक्रेताओं की तुलना की गई थी? जब स्थानीय स्तर पर कृषि उपकरणों के विक्रेता मौजूद हैं, तो दूर की फर्म से इतनी अधिक कीमत पर खरीद का आधार क्या था? वहीं पंचायतों से मिले दस्तावेजों की पड़ताल में बिलों पर HSN कोड का कॉलम खाली होने की बात सामने आई है. अब इसकी वैधता और GST/GeM नियमों के अनुरूपता की जांच जरूरी है. मूल टैक्स इनवॉयस, GST विवरण और GeM पर दर्ज उत्पाद की जानकारी सामने आने के बाद ही साफ होगा कि बिलिंग प्रक्रिया पूरी तरह नियमों के मुताबिक थी या नहीं. पंचायतों से मिली जानकारी के अनुसार कुछ मामलों में GeM पर ऑर्डर देने से पहले आवश्यक अनुशंसा और सामग्री पहुंचने के बाद निर्धारित सत्यापन प्रक्रिया पूरी नहीं होने का आरोप है. यदि टैंकर वास्तव में प्रस्ताव से पहले पहुंच गया था, तो फिर उसका ऑर्डर किसने और कब दिया? सामग्री की गुणवत्ता किस अधिकारी ने जांची? और भुगतान से पहले सत्यापन किस आधार पर हुआ? इन सवालों के जवाब सरकारी रिकॉर्ड से निकलेंगे.

सरपंच और सचिवों ने क्या कहा?
अछोली सरपंच नंदकुमार साहू ने मामले को लेकर कहा कि टैंकर खरीदी प्रक्रिया के लिए जेम पोर्टल प्रोसेस की जानकारी नहीं थी. टैंकर पहले आया गया था. बाद में खरीदी का प्रक्रिया पूरी की गई. ग्राम पंचायत अछोली सचिव पूर्निमा मंडावी ने कहा कि 15वें वित्त आयोग  के तहत 2.50 लाख रुपए की लागत से पानी टैंकर खरीदा गया है. जेम पोर्टल से खरीदी की गई है. ग्राम पंचायत पलानदूर सचिव हरिशचंद्र चंद्रवंशी ने बताया कि पानी टैंकर आने के बाद खरीदी का प्रस्ताव भेजा गया. इसकी स्वीकृति राशि 2.50 लाख रुपए है. जिला पंचायत सदस्य किरण साहू द्वारा सप्लाई किया गया है. भुगतान के पूर्व सामाग्री का सत्यापन प्राधिकृत अधिकारी द्वारा नहीं किया गया है.

जांच में खुल सकता है राज
मामले में प्रति टैंकर एक से डेढ़ लाख रुपये तक के कथित कमीशन के आरोप भी लगाए जा रहे हैं. इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है. लेकिन यदि जांच में यह साबित होता है कि सरकारी भुगतान और वास्तविक खरीद कीमत के बीच असामान्य अंतर था, तो उस अंतर की रकम का लाभ किसे मिला, यह जांच का सबसे अहम बिंदु होगा. जिन टैंकरों को पंचायत की राशि से खरीदा गया, उनकी बॉडी पर संबंधित जनप्रतिनिधियों के नाम लिखे जाने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. यदि सरकारी राशि से खरीदी गई सामग्री को किसी जनप्रतिनिधि के व्यक्तिगत विकास कार्य के रूप में प्रचारित किया गया है, तो इसकी वैधानिकता और औचित्य भी जांच के दायरे में आना चाहिए. पूरे मामले में पंचायतों के प्रस्ताव, प्रशासनिक स्वीकृति, GeM ऑर्डर, वेंडर की जानकारी, टैक्स इनवॉयस, HSN विवरण, भुगतान रिकॉर्ड, टैंकर की वास्तविक कीमत और सामग्री सत्यापन जैसे दस्तावेजों के आधार पर शिकायत की तैयारी की जा रही है. जांच हुई तो यह सिर्फ महंगे टैंकर की खरीदी का मामला नहीं रहेगा, बल्कि 15वें वित्त की राशि से लेकर GeM पर ऑर्डर और पंचायत खाते से भुगतान तक पूरी प्रक्रिया की परतें खुल सकती हैं.

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है, सरकारी टैंकर की कीमत बाजार से इतनी ज्यादा क्यों और खरीद की प्रक्रिया इतनी गोपनीय क्यों रही? बता दें कि ऐसा ही मामला खैरागढ़ जिले में भी सामने आया है, जहां टैंकर खरीदी में धांधली करने का आरोप लगा है. 5000 लीटर क्षमता वाले ट्रैक्टर-ट्रॉली टैंकर की कीमत करीब 1.80 लाख से 2 लाख रुपए के आसपास बताई जा रहा है, जबकि यहां एक टैंकर के लिए 3 लाख रुपए की राशि स्वीकृत किया गया है.

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