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मातृभाषा बनाम अंग्रेजी की मिल्कियत, मजबूत तर्को के साथ संसद में अपनी बात रखते मनसुख मंडाविया

डा. खुशबू गुप्ता। भाषा एक माध्यम होता है जिसके द्वारा व्यक्ति अपने विचारों को, किसी भी विषय का ज्ञान, उसकी योग्यता और अपनी समझ को अभिव्यक्त करता है। यह योग्य, विकसित और बौद्धिक कहलाने, समृद्धशाली, अभिजात होने का मानदंड नहीं है, बल्कि भाषा व्यक्ति की अपनी एक विशिष्ट पहचान है। किसी भी राष्ट्र की संस्कृति, परंपरा उसके अतीत की संपदा है जो उसे श्रेष्ठ बनाती है। भाषा न केवल संस्कृति, ज्ञान, परंपरा का संवहन करती है, बल्कि विकास की प्रक्रिया में सहयोग भी करती है।

इसी संदर्भ में यदि भाषा व्यक्ति की बौद्धिकता और उसकी योग्यता पर ही प्रश्न चिन्ह लगाए तो बहुत चिंताजनक और दुखद है। बीते दिनों नरेंद्र मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का पहला मंत्रिमंडल विस्तार कई मायनों में ऐतिहासिक रहा। एक तरफ जहां मंत्रिमंडल का आकार बढ़ा कर नए चेहरों को शामिल किया गया, वहीं सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन का ख्याल रखते हुए अपने क्षेत्रों के विशेषज्ञ जैसे डाक्टर, इंजीनियर, कानून और प्रशासनिक अनुभव रखने वाले सदस्यों को वरीयता दी गई। गौरतलब है कि इन सभी नए सदस्यों में भारत के नए स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री मनसुख मंडाविया के कुछ पुराने ट्वीट को लेकर इंटरनेट मीडिया पर उनकी अंग्रेजी का बहुत मजाक बनाया गया जो दुखद है। भारतवर्ष एक ऐसा राष्ट्र है जहां विविध भाषा, वेश-भूषा, संस्कृति, धर्म को समाहित किए हुए है। विविधता में एकता, इसकी मूल विशेषता के रूप में परिलक्षित होता है।

वहां इस घटना से स्पष्ट रूप से यह अर्थ निकलता है कि व्यक्ति कितना ही सामथ्र्यवान क्यों न हो, व्यक्तियों का बौद्धिक स्तर कितना ही श्रेष्ठ क्यों न हो, आप किसी विषय के बारे में कितनी ज्यादा समझ क्यों न विकसित कर लिए हों, यदि आप उसकी अभिव्यक्ति सिर्फ अंग्रेजी भाषा के कारण नहीं कर सकते तो वह सब कुछ शून्य है। आपका बौद्धिक होना निर्थक है? आपकी योग्यता पर सवाल उठने चाहिए? और हां, ऐसा इसलिए घटित होता रहता है, क्योंकि सिर्फ इस देश में कुछ अंग्रेजों के गुलामों द्वारा प्रमाणपत्र दिया जाता रहा है कि यदि आपको अंग्रेजी नहीं आती तो आप व्यर्थ हैं। ऐसे तमाम तथाकथित अंग्रेजों से सिर्फ एक बार पूछिये कि आप हिंदी भाषा में अपने बौद्धिक विचारों को अभिव्यक्त करें तो शायद ही लिखने और बोलने में समर्थ होंगे। अपवाद बहुत से होंगे जो सभी भाषाओं का सम्मान करते हैं। ज्ञातव्य हो कि पूर्व में कुछ ऐसे राजनेता हमारे देश में रहे हैं जो अंग्रेजी भाषा में अपने विचारों को अभिव्यक्त करने में असहज रहे हैं। ऐसे भी राजनेता रहें हैं सदन में जिनकी लोक भाषा को सुनकर वही तथाकथित अंग्रेज वाहवाही भी करते रहे हैं।

विगत कई वर्षो से जिस प्रकार अंग्रेजी भाषा का आधिपत्य बढ़ा है, यह हमारे लिए बहुत चिंता का विषय है। जिस किसी भी राष्ट्र में अपनी मातृभाषा का मजाक बनाया जाता है उसकी उपेक्षा व सम्मान नहीं किया जाता, वह राष्ट्र उन्नति के पथ पर बढ़ने के बजाय पतन की तरफ बढ़ता है, जहां न केवल व्यक्ति का सर्वागीण विकास बाधित होता है, बल्कि उस राष्ट्र की संस्कृति, परंपरा उसका गौरवपूर्ण अतीत संकट में होता है। जिस प्रकार से हम अंग्रेजियत की तरफ बढ़ रहे हैं नई पीढ़ी के ऊपर अंग्रेजी को थोप रहे हैं, अपने आपको अभिजात बनाने की होड़ में हैं, दिखावे कर रहे हैं, हिंदी भाषा की उपेक्षा कर रहे हैं निश्चय ही हमारी मातृभाषा के लिए गंभीर संकट है।

इसी संदर्भ में बता दें कि खास कर शिक्षा जगत के क्षेत्र में विगत कई वर्षो से जिस प्रकार अंग्रेजी भाषा का आधिपत्य बढ़ा है वह हम सभी के लिए बहुत चिंताजनक है। विचारणीय इसलिए है कि बहुत से ऐसे प्रतिभाशाली छात्र जो केवल अंग्रेजी भाषा की वजह से अपने विचारों को अभिव्यक्त नहीं कर पाते, अपनी योग्यता प्रदर्शित करने में सक्षम नहीं हो पाते ऐसे छात्रों का भविष्य क्या होगा? ऐसे छात्र यदि किसी तरह अपनी शिक्षा पूर्ण भी कर लेंगे तो क्या उनका शैक्षणिक कार्य गुणवत्तापूर्ण होगा?

देश के कई ऐसे शिक्षण संस्थान हैं जो अपनी शैक्षणिक गुणवत्ता के लिए जाने जाते हैं। जहां ऐसे प्रतिभाशाली छात्रों का प्रवेश होता है जिन्होंने हिंदी या अन्य किसी भारतीय भाषा में अध्यन करके उन संस्थानों में दाखिले प्राप्त किए होते हैं। लेकिन महज अंग्रेजी भाषा की समझ न होने के कारण उनकी योग्यता पर प्रश्नचिन्ह लगाया जाता रहा है, आखिर क्यों? वो ऐसे प्रतिभासंपन्न छात्र होते हैं जिन्हें उनकी मातृभाषा में यदि अध्ययन करने दिया जाए तो न केवल देश में, बल्कि विश्व में अपनी अलग एक पहचान बनाने में सक्षम हो सकेंगे।

आज इजराइल, जापान और चीन जैसे विश्व में कई ऐसे देश हैं जो सिर्फ अपनी मातृभाषा में ही कार्य करते हैं। यही वजह है कि ऐसे देश अपनी संस्कृति, परंपरा और अपनी भाषा को अक्षुण्ण बनाए हुए हैं व विकास के पथ पर अग्रसर हैं। यह भी स्पष्ट करना आवश्यक है कि अंग्रेजी भाषा का कोई विरोध नहीं कर रहा है बस समझने की बात इतनी है कि भाषा को भाषा की तरह रहने दिया जाना चाहिए। किसी भी भाषा को थोपा नहीं जाना चाहिए। अध्यापन का कार्य यदि मातृभाषा में ही हो तो हमारे देश के विकास में देश की नई पीढ़ी का सर्वश्रेष्ठ योगदान प्राप्त हो सकेगा। भारतवर्ष विभिन्न क्षेत्रों में नए कीर्तिमान स्थापित कर विश्व पटल पर अपना दमखम दिखा सकता है।

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