Top Newsदेश

गवर्नेंस के अभाव में डूब रही शीर्ष सहकारी संस्थाओं को नवगठित सहकारिता मंत्रालय से जगी आस

सुरेंद्र प्रसाद सिंह, नई दिल्ली। इफको, कृभको, नैफेड, एनसीसीएफ और राज्यों के सहकारी फेडरेशनों समेत सैकड़ों जिला व राज्य स्तरीय सहकारी बैंकों का इतिहास उठाकर देख लें तो साफ हो जाएगा कि किस तरह ये परिवार और कार्टेल के बीच ही घूमते रहे हैं। विभिन्न सहकारी संस्थाओं के शीर्ष पर खुद को मनोनीत अथवा निर्वाचित कराने का संगठित कार्टेल है। इसके लिए परस्पर रोटेशन के आधार पर खुद को मनोनीत कराते रहते हैं। नियमों की खामियां उनके लिए मददगार होती हैं। रोचक बात यह है कि राजनीतिक विचारधारा कुछ भी हो यहां सभी भाईचारे में एकदूसरे की मदद करते हैं ताकि कार्टेल बरकरार रहे।

सुस्त पड़े सहकारी आंदोलन को मिलेगा जीवन

इन संस्थाओं का वित्तीय आकलन करें तो यह कई लाख करोड़ रुपये बैठेगा, जिसका संचालन इन्हीं लोगों के हाथों में रहता है। शायद यही कारण है कि केंद्र में बने नए सहकारिता मंत्रालय ने लोगों के कान खड़े कर दिए हैं। उन्हें डर सताने लगा है कि उनका कब्जा न खत्म हो जाए। इस नई कवायद के बाद राजनीति कौन सी करवट लेगी यह तो वक्त बताएगा लेकिन माना जा रहा है कि इससे देश के सुस्त पड़े सहकारी आंदोलन को नया जीवन मिल सकता है।

तत्काल सुधार की जरूरत

सहकारी आंदोलन को समर्थन देकर युवाओं को रोजगार और वंचितों को जीवन यापन के साधन मुहैया कराए जा सकते हैं। लेकिन इस दिशा में सरकारी स्तर पर कभी गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया। सहकारिता क्षेत्र में सुधार की तत्काल जरूरत है, जिसके लिए कई कड़े कदम उठाने पड़ सकते हैं। कई सहकारी संस्थानों की हैसियत मल्टीनेशनल कंपनियों से कम नहीं है, लेकिन उन पर काबिज सहकारी नेताओं ने उन्हें अपना साम्राज्य जैसा बना लिया है।

सहकारी आंदोलन को देनी होगी गति

चर्चित अर्बन सहकारी बैंक घोटाले और अन्य ग्रामीण जिला व राज्य सहकारी बैंकों की खस्ता हालत के जिम्मेदार लोगों की नकेल कसनी होगी, जिससे आम लोगों का विश्वास सहकारी क्षेत्र में बढ़ाया जा सके। नए मंत्रालय को 97वें संविधान संशोधन के तहत मिले अधिकार की बहाली के लिए अदालत में विचाराधीन मामले की पैरवी करनी होगी। इसके तहत राज्यों को माडल कानून लागू कर सहकारी आंदोलन को गति देनी होगी।

बनाना होगा अलग निर्वाचन आयोग

राज्यों में सहकारी क्षेत्र के चुनाव के लिए अलग निर्वाचन आयोग बनाना होगा। कोआपरेटिव रजिस्ट्रार की नियुक्ति के साथ उसे पर्याप्त अधिकार सौंपने होंगे, ताकि लागू माडल कानून के तहत पूरे सिस्टम की निगरानी की जा सके। नवगठित सहकारिता मंत्रालय से बड़ी अपेक्षाएं हैं।

निगरानी नहीं होने से पारदर्शिता का अभाव

मल्टी स्टेट कोआपरेटिव सोसायटी एक्ट बनने के बाद ही देश में सहकारी क्षेत्र की कई बड़ी कंपनियां स्थापित की गईं। इनमें केंद्रीय मदद भी ली गई, लेकिन अब उनमें सरकार की हिस्सेदारी धेले भर की भी नहीं है। सरकारी निगरानी नहीं होने से उनमें पारदर्शिता का अभाव है, जिससे इन कंपनियों के प्रबंधन में घूम फिरकर गिनती के वही लोग सर्वेसर्वा होते हैं। इनमें और सहकार सदस्यों को कभी स्थान प्राप्त नहीं होता। पूर्ववर्ती सरकारों में रहे राजनीतिक दलों के नेताओं के एक वर्ग के लिए यह दुधारू गाय है।

40 करोड़ सदस्यों के जरिये साधी जाती है राजनीति

सहकारिता की आठ लाख प्राइमरी सोसायटियों में तकरीबन 40 करोड़ सदस्य हैं। जाहिर है कि इसके जरिये राजनीति साधी जाती रही है। सहकारी क्षेत्र को मजबूत और कारगर बनाने के लिए केंद्र सरकार ने राज्यों को सारे सिस्टम का कंप्यूटरीकरण करने के लिए वित्तीय मदद प्रदान की। इसके बावजूद बमुश्किल एक दर्जन राज्यों में ही यह किया जा सका है। पूरे सिस्टम को आनलाइन करने की कोशिशें कभी नहीं की गईं। सहकारी संस्थाओं के देशव्यापी इंफ्रास्ट्रक्चर का उपयोग कर निचले स्तर पर रोजी-रोजगार बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

khabarbhoomi

खबरभूमि एक प्रादेशिक न्यूज़ पोर्टल हैं, जहां आपको मिलती हैं राजनैतिक, मनोरंजन, खेल -जगत, व्यापार , अंर्राष्ट्रीय, छत्तीसगढ़ , मध्याप्रदेश एवं अन्य राज्यो की विश्वशनीय एवं सबसे प्रथम खबर ।

Show More

khabarbhoomi

खबरभूमि एक प्रादेशिक न्यूज़ पोर्टल हैं, जहां आपको मिलती हैं राजनैतिक, मनोरंजन, खेल -जगत, व्यापार , अंर्राष्ट्रीय, छत्तीसगढ़ , मध्याप्रदेश एवं अन्य राज्यो की विश्वशनीय एवं सबसे प्रथम खबर ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button