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सुप्रीम कोर्ट के फैसले से UPSC 2025 के 958 चयनित अफसरों को मिली राहत, सर्विस अलॉटमेंट का रास्ता साफ

ओबीसी क्रीमी लेयर विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के शु्क्रवार को आए फैसले से यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा 2025 में चयनित 958 अफसरों के करियर का रास्ता साफ हो गया है। अब उन्हें आईएएस, आईपीएस, आईएफएस, आईआरएस समेत तमाम सर्विस और कैडर अलॉट हो सकेंगे। अभी तक इनकी मसूरी स्थित लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी (LBSNAA) में इनकी ट्रेनिंग शुरू नहीं हो सकी है जबकि आमतौर पर यह अगस्त के आखिर या सितंबर की शुरुआत में शुरू होता है। आजादी के बाद यह पहली बार है जब फाउंडेशन कोर्स रुका हुआ है। इसके अलावा अब भारतीय वन सेवा परीक्षा 2025 में चुने गए 148 उम्मीदवारों के लिए भी सर्विस अलॉटमेंट, ट्रेनिंग और इंडक्शन का रास्ता साफ हो जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सुनवाई करते हुए क्रीमीलेयर को लेकर अपना पुराना फैसला बरकरार रखा। कोर्ट ने 11 मार्च के अपने फैसले में कहा था कि सिर्फ माता-पिता के सैलरी या आय आधार बनाकर उनके बच्चों को ओबीसी की क्रीमीलेयर में शामिल नहीं किया जा सकता।

यूपीएससी के 100 ओबीसी उम्मीदवारों को चयन का मौका
इस फैसले से लगभग 100 ओबीसी उम्मीदवारों को भी अपनी मेरिट के आधार पर अलग-अलग सिविल सेवाओं में शामिल होने का मौका मिल सकता है। 2016 के बाद से उनके जाति प्रमाण पत्रों को इस आधार पर खारिज कर दिया गया था कि वे क्रीमी लेयर में आते हैं, जिसके कारण उनका CSE चयन भी रद्द हो गया था।

बेंच ने कहा कि 11 मार्च के फैसले में यह माना गया था कि संबंधित उम्मीदवार ओबीसी कैटेगरी की नॉन-क्रीमी लेयर में आते हैं इसलिए वे आरक्षण का लाभ पाने के हकदार हैं, और जिस चयन प्रक्रिया में उन्होंने हिस्सा लिया था, उसके अनुसार उन्हें पद और सेवा आवंटन भी मिलना चाहिए।

इसका मतलब यह है कि जिन उम्मीदवारों के माता-पिता PSU (सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों), निजी क्षेत्र की कंपनियों, स्कूलों या अन्य संस्थानों में काम करते हैं, उनके मामले में केवल वेतन या आय के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि वे क्रीमी लेयर में आते हैं या नहीं। 1993 के सरकारी आदेश के अनुसार उनके माता-पिता जिस पद पर काम कर रहे हैं, उसका दर्जा और श्रेणी भी ध्यान में रखी जानी चाहिए।

सैलरी के आधार पर ओबीसी एनसीएल से बाहर करना भेदभावपूर्ण
1993 के आदेश में क्रीमी लेयर तय करने के लिए होने वाली आय और संपत्ति की जांच में वेतन और कृषि से होने वाली आय को शामिल नहीं किया गया था। हालांकि 2004 में सरकार ने PSU और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के वेतन को भी इसमें शामिल कर लिया, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गईं। अदालत ने फैसला सुनाया कि PSU और निजी क्षेत्र में काम करने वाले OBC माता-पिता के बच्चों को केवल उनकी आय के आधार पर आरक्षण के लाभ से बाहर रखना और उनके पदों की श्रेणी (जैसे ग्रुप A या B, या ग्रुप C या D) पर विचार न करना एक तरह का भेदभावपूर्ण बर्ताव होगा।

डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल एंड ट्रेनिंग' (DoPT) के 2004 के स्पष्टीकरण में कहा गया था कि जहां निजी या सार्वजनिक क्षेत्र के पदों और सरकारी पदों के बीच समानता का मूल्यांकन नहीं किया गया है, वहां क्रीमी लेयर का दर्जा तय करने के लिए माता-पिता की सैलरी (आय) को अन्य स्रोतों से होने वाली आय से अलग रखकर देखा जाएगा। यह फॉर्मूला कांग्रेस के नेतृत्व वाली UPA सरकार के दौरान लागू नहीं किया गया था, लेकिन BJP के सत्ता में आने के दो साल बाद 2016 में इसे लागू किया जाने लगा।

ओबीसी क्रीमी लेयर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की अन्य बातें
फैसले का लाभ सीमित- मार्च 2026 के फैसले में 2004 के सरकारी आदेश को रद्द करने का लाभ केवल उन लोगों को मिलेगा, जिन्होंने इस फैसले को अदालत में चुनौती दी थी।

पुरानी नियुक्तियां सुरक्षित- पहले से नियुक्त हो चुके और कैडर आवंटित करा चुके अभ्यर्थियों की नियुक्तियों पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

भर्तियां दोबारा नहीं खुलेंगी- सुप्रीम कोर्ट के फैसले को आधार बनाकर पहले पूरी हो चुकी चयन प्रक्रियाओं और नियुक्तियों को दोबारा नहीं खोला जा सकेगा।

लंबित मामलों पर विचार- समान स्थिति वाले अभ्यर्थियों के अदालतों या अन्य सक्षम मंचों पर लंबित मामलों पर उनकी योग्यता और तथ्यों के आधार पर विचार किया जा सकता है।

क्या है क्रीमी लेयर का सिस्टम
क्रीमी लेयर की अवधारणा को सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक इंद्रा साहनी मामले में पेश किया था। क्रीमी लेयर के जरिए आरक्षण का लाभ OBC वर्ग के भीतर वास्तव में पिछड़े लोगों तक पहुंचाने की कोशिश की जाती है। लंबे समय से यह सवाल उठता रहा है कि अलग-अलग तरह के रोजगार में किसी व्यक्ति की स्थिति और आय को कैसे मापा जाए। जो लोग सरकारी सेवा में नहीं हैं उनके लिए आय की सीमा 1993 में 1 लाख रुपये प्रति वर्ष तय की गई थी, जिसे बाद में 2004, 2008 और 2013 में संशोधित किया गया। 2017 में इस सीमा को बढ़ाकर 8 लाख रुपये प्रति वर्ष कर दिया गया। यह तब से अब तक नहीं बदली है।

क्रीमी लेयर के दायरे में वे लोग आते हैं जो संवैधानिक पदों पर हैं, ऑल इंडिया सर्विस और केंद्र व राज्य सेवाओं के ग्रुप A/क्लास I अधिकारी (यदि माता-पिता में से कोई भी सीधे भर्ती हुआ हो या 40 साल की उम्र से पहले प्रमोशन पाकर इस पद पर पहुंचा हो); केंद्र और राज्यों के ग्रुप B/क्लास II अधिकारी (दोनों माता-पिता) और इसी स्तर के पदों पर काम करने वाले PSU कर्मचारी। सशस्त्र बलों के अधिकारी (लेफ्टिनेंट कर्नल से ऊपर के रैंक वाले) पेशेवर और व्यापार या उद्योग से जुड़े लोग, संपत्ति के मालिक, और वे लोग जो आय/संपत्ति की सीमा के दायरे में आते हैं।

हालांकि 2017 में कुछ पीएसयू के पदों और सरकारी पदों के बीच समानता तय कर दी गई थी, लेकिन निजी क्षेत्र, विश्वविद्यालयों, शैक्षणिक संस्थानों और विभिन्न राज्य सरकारी संगठनों के लिए यह सवाल अभी भी अनसुलझा है। नतीजतन इन क्षेत्रों में काम करने वाले कर्मचारियों को उनके माता-पिता की आय के आधार पर क्रीमी लेयर में वर्गीकृत किया जा रहा था।

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