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वोटर लिस्ट से नाम हटाने पर बहस तेज, सुरजीत भल्ला के आकलन में 70 लाख मतदाताओं के नाम हटने की वजह अस्पष्ट

नई दिल्ली
चुनाव आयोग की मतदाता सूचियों के SIR के तहत 13 करोड़ से ज्यादा नाम हटाए जाने को लेकर देश भर में बहस छिड़ी हुई है. लेकिन इस आंकड़े के बीच सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या सच में इतनी बड़ी संख्या में योग्य मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं?

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला ने शनिवार को प्रकाशित अपने एक विश्लेषण में इस सवाल का बारीकी से अध्ययन किया है। उनके मुताबिक, जिन राज्यों में पुनरीक्षण प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, वहां लगभग 70 लाख ऐसे योग्य मतदाता हो सकते हैं जिनके नाम हटाए जाने का कोई सही कारण नहीं मिल पाया है.

सुरजीत भल्ला का कहना है कि 13 करोड़ का आंकड़ा SIR के तीनों चरणों के ड्राफ्ट स्तर के डिलीटेड नामों को जोड़कर दिखाया जा रहा है. इसमें मृत व्यक्तियों, स्थायी रूप से दूसरी जगह रहने वाले लोगों और दोहरे नामों को हटाने जैसी वैध प्रक्रियाएं शामिल हैं. इसके अलावा, इसमें वो राज्य भी शामिल हैं जहां फाइनल वोटर लिस्ट अभी जारी नहीं हुई है.

क्या है 13 करोड़ नाम हटाने का पूरा गणित?
चुनाव आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, SIR के तीनों चरणों के तहत ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से 13.37 करोड़ नाम हटाए गए थे. इनमें से 7.22 करोड़ नाम दूसरे चरण के तहत बिहार और दूसरे 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से हटाए गए, जबकि 6.15 करोड़ नाम तीसरे चरण के 17 राज्यों से हटाए गए.

भल्ला के विश्लेषण और आंकड़ों के मुताबिक, इन कटौतियों में लगभग 2.8 करोड़ मृत मतदाता, 6.3 करोड़ स्थानांतरित (रिलोकेटेड) लोग, 1 करोड़ डुप्लिकेट प्रविष्टियां और 3 करोड़ ऐसे लोग शामिल थे जिनका कोई पता नहीं चल सका था. भल्ला का कहना है कि इन श्रेणियों को 'गलत तरीके से हटाया गया नाम' नहीं माना जा सकता.

लेकिन मुद्दा ये है कि जिन लोगों को वोटर लिस्ट में नहीं होना चाहिए था, उन्हें हटाने के बाद कितने योग्य मतदाता सूचियों से बाहर रह गए.

भल्ला ने कैसे तैयार किया ये गणितीय अनुमान?
भल्ला ने वर्ष 2026 के मध्य में भारत की वयस्क आबादी लगभग 100.8 करोड़ मानी है. उनका कहना है कि भारत में मतदान के लिए पंजीकरण स्वैच्छिक है, इसलिए 100% वयस्कों का नाम वोटर लिस्ट में होना प्रैक्टिकल नहीं है.

18 से 29 वर्ष की आयु वर्ग के डेटा के आधार पर उन्होंने अनुमान लगाया कि देश में लगभग 8.5% एडल्ट रजिस्टर नहीं हैं. इस हिसाब से एक पारदर्शी और साफ-सुथरी वोटर लिस्ट का बेंचमार्क लगभग 92.2 करोड़ होना चाहिए.

जिन नौ बड़े राज्यों में SIR की फाइनल लिस्ट आ चुकी है, वहां साफ-सुथरी लिस्ट के मुताबिक 53.51 करोड़ नाम होने चाहिए थे, जबकि फाइनल लिस्ट में 52.78 करोड़ नाम दर्ज हुए. इस तरह लगभग 73 लाख नामों की कमी सामने आई.

लगभग 5 लाख गैर-नागरिकों के नाम वैध रूप से हटाए जाने का समायोजन करने के बाद, भल्ला का अनुमान है कि लगभग 70 लाख योग्य मतदाताओं के नाम बिना किसी स्पष्ट कारण के हट गए हैं. भल्ला लिखते हैं कि फाइनल लिस्ट वाले राज्यों में 5.8 करोड़ की कुल कटौती में से लगभग 5.1 करोड़ पूरी तरह से जरूरी और सही थीं, जबकि 70 लाख कटौतियां स्पष्टीकरण से परे हैं.

भल्ला ने लिखा, 'अस्पष्ट का मतलब ये नहीं है कि 70 लाख लोगों को गलत तरीके से हटाया ही गया है, लेकिन प्रभावित लोगों के लिए ये एक बड़ा मुद्दा है. फिर भी, ये आंकड़ा हर सौ वयस्कों में एक से भी कम है, न कि हेडलाइंस में जैसा दिखाया जा रहा है कि हर सात में से एक वयस्क प्रभावित हुआ है.'

भारतीय मतदाता सूचियों का इतिहास
भल्ला ने इस पूरे विवाद की तुलना भारत में मतदाता सूचियों के ऐतिहासिक इतिहास से की है. उन्होंने ध्यान दिलाया कि देश भर में हुए पिछले गहन पुनरीक्षण के बाद, 2004 की वोटर लिस्ट में वयस्क आबादी के अनुमान से 2.8 करोड़ ज्यादा नाम थे (4.4% ज्यादा). वहीं, 2014 की मतदाता सूची में भी वयस्क आबादी से 3.1% ज्यादा नाम दर्ज थे.

उन्होंने कहा कि उस समय न तो कोई विवाद खड़ा हुआ था और न ही चुनाव आयोग पर सूची में हेरफेर करने के आरोप लगे थे. लगभग एक अरब लोगों के देश में घर-घर जाकर वेरिफिकेशन करना एक मुश्किल काम है, खासकर तब जब देश में प्रवासी मजदूरों और गरीब आबादी की संख्या ज्यादा हो. हालांकि, उन्होंने SIR की तेज रफ्तार, गरीबों से मांगे गए दस्तावेजों और 'तार्किक विसंगतियों' के नाम पर जारी नोटिसों पर उठ रहे सवालों पर भी ध्यान दिलाया.

पश्चिम बंगाल और बिहार की स्थिति
राष्ट्रीय स्तर पर भले ही ये आंकड़ा कम दिखाई देता हो, लेकिन राज्य स्तर पर पश्चिम बंगाल एक बड़े अपवाद के रूप में उभरा है.

पश्चिम बंगाल: भल्ला का अनुमान है कि पश्चिम बंगाल में करीब 50 लाख योग्य मतदाताओं के नाम बिना स्पष्ट कारण के हटा दिए गए हैं, जो राज्य की वयस्क आबादी का लगभग 6 से 7 प्रतिशत है. राज्य में मतदाता सूची 7.66 करोड़ से घटकर 6.77 करोड़ (11.6% की गिरावट) पर आ गई.

भल्ला के मुताबिक, 'तार्किक विसंगतियों' के आधार पर अप्रैल 2026 में 27 लाख नाम हटाए गए थे, जिनमें लगभग दो-तिहाई मुस्लिम मतदाता थे.

बिहार: बिहार की फाइनल लिस्ट में अभी भी लगभग 60 लाख नाम ऐसे हैं जो वास्तविक आंकड़े से ज्यादा हैं. इसकी असल वजह राज्य के वो प्रवासी मजदूर हैं जो दूसरे राज्यों में रहते हैं, लेकिन उनके नाम बिहार की लिस्ट में दर्ज हैं.

सुरजीत भल्ला के इस अध्ययन से पता चलता है कि भले ही मतदाता सूची को साफ करने की ये प्रक्रिया जरूरी थी. लेकिन इसे लागू करने के तरीके और अस्पष्ट रूप से हटाए गए 70 लाख नामों ने चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.

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