
नई दिल्ली
झारखंड की लोक संस्कृति और विरासत में नचनी नृत्य की खास जगह है। झारखंड के साथ-साथ यह लोक नृत्य पश्चिम बंगाल के क्षेत्रों में भी काफी मशहूर है।
इस नृत्य की खासियत है कि ये सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं है। इसमें झारखंड की संस्कृति की अनोखी झलक देखने को मिलती है। आइए जानें क्यों इतना खास है नचनी नृत्य और ये कैसे किया जाता है।
कैसे हुई थी नचनी नृत्य की शुरुआत?
माना जाता है कि नचनी नृत्य की शुरुआत भी कई अन्य नृत्यों की तरह ही मंदिरों से हुई। समय के साथ ये नृत्य मंदिरों से बाहर निकली और और उस दौर के राजाओं के दरबारों की शान बनीं। अपने दरबार में मनोरंजन के लिए राजाओं ने इस नृत्य के कलाकारों को संरक्षण दिया।
इस नृत्य की नृतकी को नचनी कहा जाता है और पुरुष को रसिक। इनके साथ ढोल आदि बजाने वाले संगीतकार भी शामिल होते हैं। इस नृत्य को करने वाली महिलाओं के नाम पर ही इस लोक नृत्य को नचनी नाम मिला। अंग्रेजों के शासन और आजादी के बाद यह नृत्य आम जनता तक पहुंचा।
दिखाते हैं राधा-कृष्ण की रास लीलाएं
आमतौर पर इस नृत्य में स्थानीय लोक कथाएं और राधा-कृष्ण की रासलीलाएं दिखाई जाती हैं। इस नृत्य में नचनी और रसिक मिलकर रास-लीला का प्रसंग पेश करते हैं, लेकिन शुरुआत में रसिक सिर्फ नृत्य में साथी नहीं, बल्कि नचनी का गुरु भी माना जाता था।
ऐतिहासिक रूप से नचनी नृत्य करने वाली महिलाओं का जीवन काफी मुश्किल रहा है। उन्हें समाज में कभी वो सम्मान नहीं दिया गया, जो दूसरे कलाकारों को दिया जाता है। इस नृत्य को करने वाले रसिक ही, नचनी को आश्रय देते हैं, क्योंकि उन्हें न तो इसके पैसे मिलते थे और न ही सम्मान।
नचनी नृत्य की खासियत क्या है?
नचनी नृत्य में भक्ति और शृंगार रस देखने को मिलता है। इसमें गीत और नृत्य के जरिए प्रेम, विरह और भक्ति की भावना को जाहिर किया जाता है। इस नृत्य के लिए काफी चमकीले और पारंपरिक पोशाक पहनी जाती है, जो झारखंड के छोटा नागपुर क्षेत्र की संस्कृति को दिखाती है। साथ ही, इसमें भारी आभूषण, घुंघरू और खास तरह का मेकअप किया जाता है।
यह नृत्य पूरी तरह से लोक संगीत पर आधारित है, जिसमें ढोल, नगाड़ा, शहनाई और बांसुरी जैसे वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल किया जाता है। गीतों की भाषा भी नागपुरी या कुरमाली जैसी स्थानीय बोलियां होती हैं।
कैसे किया जाता है नचनी नृत्य?
नचनी नृत्य अक्सर खास मौकों और त्योहारों पर खुले में प्रदर्शित किया जाता है। नचनी अपने भावों के साथ धीमी चाल में नृत्य की शुरुआत करती है। इसके साथ ही, रसिक भी आता है, जो वाद्य यंत्रों के साथ गीत गाता है। जैसे-जैसे संगीत की धुन तेज होती है, नृतकी की चाल भी तेज होती है। घुंघरुओं की झंकार, शरीर की मुद्राएं और चेहरे के भावों से यह नृत्य खास बनता है।






