बिहार

केसरिया स्तूप की रेप्लिका बनेगी पर्यटक केंद्र की पहचान, पांच एकड़ में सुविधाएं तैयार

 मोतिहारी (पूर्वी चंपारण)
 केसरिया बौद्ध स्तूप वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना चुका है। प्रतिदिन हजारों देसी-विदेशी सैलानी स्तूप देखने यहां पहुंचते हैं।

पर्यटकों की सुविधा के लिए बिहार सरकार के पर्यटन विभाग द्वारा सुविधाओं का विस्तार किया जा रहा है। यहां पांच एकड़ भूभाग में आवासीय व्यवस्था के साथ कैफेटेरिया बनाया गया है।

इसके अलावा करीब 20 करोड़ रुपये की लागत से पर्यटक सुविधा केंद्र निर्माणाधीन है। खास बात यह है कि यह केंद्र केसरिया स्तूप का ही प्रतिरूप (रेप्लिका) है।

इसके चारों ओर बिहार के प्रसिद्ध बौद्ध स्थलों की रेप्लिका भी प्रदर्शित की जा रही है। इस बात का भी प्रयास किया जा रहा है कि स्तूप के आसपास के महत्वपूर्ण स्थलों का भी उत्खनन कर उनका विकास किया जाए।

यहां बता दें कि वर्ष 1998 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) द्वारा उत्खनन एवं संरक्षण शुरू किया गया था। हालांकि अब तक स्तूप के लगभग 60 प्रतिशत हिस्से का ही उत्खनन हो सका है। संरक्षण का प्रतिशत उससे भी कम है।

केसरिसा स्तूप का इतिहास
उत्खनन से पूर्व इस स्थल को स्थानीय लोग देउर के नाम से जानते थे। लोगों का मानना है कि इसका संबंध पौराणिक काल के राजा वेणु से है। हालांकि उत्खनन के बाद यह बौद्ध स्तूप के रूप में दुनिया के सामने आया। कहा जाता है कि 104 फीट की उंचाई के साथ यह दुनिया का सबसे बड़ा स्तूप है।

माना जाता है कि वर्ष 1934 के विनाशकारी भूकंप से पहले इसकी उंचाई 150 फीट तक थी। भूकंप में इसे भारी क्षति पहुंची थी। अनुमान है कि स्तूप का एक बड़ा हिस्सा जमीन के नीचे दबा पड़ा है।

ब्रिटिश शासन काल में भी इसके उत्खनन की कोशिश की गई थी। वर्ष 1814 में मैकेंजी एवं 1861 में एलेक्जेंडर कनिंघम के प्रयासों के सबूत आज भी उपलब्ध हैं। लेकिन कतिपय कारणों से तब उत्खनन रोक दिया गया था।

इस स्थान की चर्चा चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा वृतांत में भी मिलती है। उल्लेखनीय है कि छह तलों एवं एक गुंबद वाले इस स्तूप पर बने कोष्टकाें में बुद्ध की क्षतिग्रस्त मूर्तियां मिली हैं।

माना जाता है कि है कि भारत की संस्कृति एवं विरासत को नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से विदेशी आक्रांताओं द्वारा हमला कर इन मूर्तियों को क्षतिग्रस्त कर दिया गया होगा।

बुद्ध से स्तूप का संबंध
जानकार बताते हैं कि गृह त्याग के बाद राजकुमार सिद्धार्थ ने सबसे पहले राजसी वस्त्रों का त्याग इसी स्थान पर किया था। यहीं पर उन्होंने संन्यासी का वस्त्र धारण कर पहली दीक्षा ली थी। इसके बाद वे आगे निकल गए।

बौद्ध धर्मग्रथों के अनुसार अंत समय में महापरिनिर्वाण के लिए कुशीनारा (कुशीनगर, उप्र) जाने के क्रम में उन्होंने इसी स्थान पर एक रात बिताई थी। उनके साथ बड़ी संख्या में शिष्य भी चल रहे थे।

भगवान बुद्ध ने अपने शिष्य आनंद को स्मृति चिन्ह के रूप में अपना भिक्षा पात्र देकर सभी शिष्यों को वापस वैशाली लौट जानें को कहा। इसके बाद वे कुशीनारा के लिए रवाना हो गए, जहां उनका महापरिनिर्वाण हुआ।

बुद्ध से जुड़ी स्मृतियों को ध्यान में रखते हुए इसी स्थान पर तत्कालीन शासकों द्वारा स्तूप को निर्माण कराया गया। इसके निर्माण में शुंग, कुषाण एवं गुप्त काल के प्रमाण मिलते हैं।

  •     पूर्वी चंपारण में केसरिया बौद्ध स्तूप का अभी तक नहीं हो सका पूरा उत्खनन
  •     वर्ष 1998 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने शुरू किया गया था उत्खनन एवं संरक्षण का कार्य
  •     104 फीट उंचाई वाले इस स्तूप के पास पर्यटन विभाग द्वारा किया जा रहा सुविधाओं का विस्तार

 

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