बिहार

संस्थान का अजीब फरमान: ट्रेनिंग के दौरान शादी पर लगी रोक

गोपालगंज
बिहार में गोपालगंज के हथुआ में स्थित जीएनएम (जनरल नर्सिंग एंड मिडवाइफरी) प्रशिक्षण संस्थान के प्राचार्य द्वारा जारी आदेश में कहा गया है कि ट्रेनिंग के दौरान कोई भी छात्रा शादी नहीं कर सकती. यदि कोई छात्रा इस नियम का उल्लंघन करती है, तो उसका नामांकन रद्द कर दिया जाएगा। 

यह आदेश कॉलेज परिसर में नोटिस के रूप में चस्पा किया गया था, जो देखते ही देखते सोशल मीडिया पर वायरल हो गया. वायरल होते ही इस फरमान को लेकर लोगों में नाराजगी फैल गई और इसे छात्राओं की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप बताया जाने लगा। 

संस्थान की प्राचार्या मानसी सिंह ने इस आदेश को लेकर सफाई भी दी है. उनका कहना है कि नर्सिंग की पढ़ाई पूरी तरह आवासीय होती है, जहां छात्राएं संस्थान की निगरानी में रहकर प्रशिक्षण लेती हैं। 

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ऐसे में यदि छात्राएं शादी कर लेती हैं, तो उनकी पढ़ाई और प्रशिक्षण प्रभावित हो सकता है. उन्होंने यह भी दावा किया कि यह नियम कोई नया नहीं है, बल्कि विभागीय दिशा-निर्देशों के तहत पहले से ही लागू है. नामांकन के समय ही छात्राओं से एक घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर कराए जाते हैं, जिसमें यह शर्त शामिल होती है कि वे प्रशिक्षण के तीन वर्षों के दौरान शादी नहीं करेंगी। 

हालांकि, यह तर्क लोगों को रास नहीं आया और मामला तूल पकड़ता चला गया. सोशल मीडिया पर इस आदेश को ‘अजीबोगरीब’ बताते हुए आलोचना की जा रही है. कई लोगों ने इसे छात्राओं के व्यक्तिगत जीवन और अधिकारों में दखल बताया है। 

मामले के तूल पकड़ने के बाद जिला प्रशासन ने भी संज्ञान लिया है. गोपालगंज के जिलाधिकारी पवन कुमार सिन्हा ने कहा है कि वायरल नोटिस की जांच के आदेश दे दिए गए हैं. उन्होंने हथुआ एसडीएम को 24 घंटे के भीतर जांच कर रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है. डीएम ने साफ किया कि जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। 

इधर, स्वास्थ्य विभाग की ओर से भी इस मामले में सख्त रुख अपनाया गया है. गोपालगंज के सिविल सर्जन डॉ. बीरेंद्र प्रसाद ने बताया कि उन्हें इस मामले की जानकारी मिलने के बाद तुरंत जांच कराई गई. जांच के बाद प्राचार्य द्वारा जारी आदेश को रद्द कर दिया गया है. साथ ही प्राचार्य से इस संबंध में स्पष्टीकरण मांगा गया है. उन्होंने कहा कि यदि संतोषजनक जवाब नहीं मिलता है, तो संबंधित अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। 

सवाल उठ रहे हैं कि क्या किसी छात्रा के निजी जीवन से जुड़े ऐसे फैसलों पर संस्थान रोक लगा सकता है? क्या इस तरह के नियम संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं हैं? फिलहाल प्रशासन जांच में जुटा है और सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि इस मामले में आगे क्या कार्रवाई होती है। 

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