
नई दिल्ली
बिहार की राजनीति में फिर एक बड़ा दिन। राज्यसभा चुनाव तो भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन और राष्ट्रीय लोक मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा भी लड़ रहे हैं, लेकिन सबसे ज्यादा ध्यान जनता दल यूनाईटेड के राष्ट्रीय अध्यक्ष व बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर है। नितिन विधायक रहते सांसदी का यह चुनाव लड़ रहे तो नीतीश विधान परिषद् सदस्य रहते। नीतीश कुमार की चर्चा इसलिए सबसे ज्यादा हो रही है, क्योंकि दिल्ली जाने के लिए उन्हें बिहार के मुख्यमंत्री का पद छोड़ना पड़ेगा और पहली बार भारतीय जनता पार्टी इस कुर्सी पर अपना आदमी बैठाएगी। ऐसे में रोचक है कि नीतीश कुमार आज के बाद फैसला क्या लेते हैं?
बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार को समझना असंभव
जब 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री के रूप में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम प्रचारित होना शुरू होता, इससे पहले नीतीश कुमार ही ऐसे बड़े नेता थे जिन्होंने पुराने रिश्ते छोड़ दिए थे। नीतीश कुमार अटल-आडवाणी के समय से भाजपा से जुड़े थे, लेकिन नमो युग की शुरुआत से पहले एनडीए से निकल गए थे। तब भी अंदाजा नहीं लग रहा था। फिर 2017 में लौटे तो 2022 में छोड़ गए। फिर 2024 में वापस साथ आए। इस साल होली के एक दिन पहले जिस तरह से वह बिहार चुनाव 2025 के तीन महीने बाद ही राज्यसभा जाने के लिए तैयार हुए, वह भी अचरज में डालने वाला था। और, अब खरमास शुरू होने से पहले उनका इस्तीफा नहीं आना भी भाजपा के लिए सिरदर्द बना हुआ है। खरमास में वह फैसला लेते भी हैं तो यही माना जा रहा है कि 15 अप्रैल तक भाजपा नए सीएम की कुर्सी पर अपना आदमी बैठाने का 'जतरा' नहीं बनाएगी।
केंद्रीय मंत्री रहे नीतीश एक बार सांसद रहते विधायक भी बने थे
नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री हैं। वह केंद्रीय मंत्री भी रह चुके हैं। वह पटना जिले की बाढ़ सीट से लोकसभा सदस्य हुआ करते थे। नालंदा जिले की हरनौत विधानसभा सीट से विधायक हुआ करते थे। इस सदी में वह कभी विधानसभा चुनाव में नहीं उतरे। विधान पार्षद ही चुने जाते रहे। अब राज्य सभा के चुनाव में हैं। नीतीश कुमार के बारे में यह जानना बेहद रोचक है कि वह 1991 में तत्कालीन जनता दल के टिकट पर बाढ़ से कांग्रेस प्रत्याशी को हराकर सांसद बने थे। इसके बावजूद उन्होंने 1995 में तत्कालीन समता पार्टी के चुनाव चिह्न पर हरनौत से विधानसभा का चुनाव लड़ा और जीते भी। विधायक चुने जाने के बाद जब लोग सांसद के रूप में उनके इस्तीफे का इंतजार कर रहे थे, लेकिन उन्होंने विधायक की शपथ नहीं ली। नतीजतन हरनौत सीट के लिए 1996 में उप चुनाव हुआ, जिसमें फिर समता पार्टी के अरुा कुमार सिंह विधायक बने।
कब केंद्र में मंत्री बने और कब-कब बिहार की राजनीति का रुख किया?
नीतीश कुमार 1985 में हरनौत विधायक चुने गए थे। इसके बाद दिल्ली की राजनीतिक यात्रा के लिए पहली बार 28 नवंबर 1989 को पटना जिले के बाढ़ संसदीय क्षेत्र से निर्वाचित हुए थे। तब, सांसद के रूप में उनका कार्यकाल 2 दिसंबर 1989 से 13 मार्च 1991 तक रहा था। अप्रैल 1990 में तत्कालीन विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार में उन्हें केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री बनाया गया था। बाद में वीपी सिंह सरकार सदन में बहुमत साबित नहीं कर सकी तो केंद्रीय राज्यमंत्री के तौर पर नीतीश कुमार का कार्यकाल भी 10 नवंबर 1990 को खत्म हो गया। 13 मार्च 1991 को लोकसभा भंग हुआ तो फिर अगले चुनाव में नीतीश कुमार फिर बाढ़ से ही सांसद चुने गए। इसके बाद, बिहार की राजनीति में वापस वह सक्रिय होते दिखे। 1995 के बिहार विधानसभा चुनाव में वह हरनौत से फिर उतरे और विधायक चुने गए, हालांकि उन्होंने लोकसभा सदस्य रहना ही उचित समझा।
इसके बाद, 1996 में फिर बाढ़ से ही नीतीश कुमार सांसद बने। तब अटल बिहारी वाजपेयी 7 दिन के लिए पीएम बने और फिर मौजूदा विपक्ष सत्ता में आ गया। 15 मार्च 1998 को अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने तो नीतीश कुमार की समता पार्टी उनके साथ थी। नीतीश कुमार को केंद्रीय रेल एवं भूतल परिवहन मंत्री बनाया गया। अगस्त 1999 में गैसाल में रेल दुर्घटना के बाद उन्होंने मंत्रीपद से इस्तीफा दे दिया। फिर करगिल युद्ध के बाद 1999 के लोकसभा चुनाव कराना पड़ा तो भाजपा बड़े दल के उभरी। पहली बार पांच साल भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार रही। नीतीश केंद्रीय मंत्री रहे। नई सदी में पहली बार जब वह चुनाव में उतरे तो 2004 के बाढ़ ने उन्हें हरा दिया। इसके बाद परिस्थितियां देख वह बिहार को सुधारने के लिए यहां उतर गए। फिर तो 2005 से बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार बतौर मुख्यमंत्री अब तक कुर्सी पर हैं। बीच में एक बार जीतन राम मांझी को उन्होंने ही सीएम बनाया था, वह भी लोकसभा चुनाव में हार की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेते हुए।






